Friday, September 14, 2018

दूसरी ओर खुजेमा क़ुतुबुद्दीन ने भी 52वें सैय्यदना का माजूम हो

दूसरी ओर खुजेमा क़ुतुबुद्दीन ने भी 52वें सैय्यदना का माजूम होने के नाते अपने को उनका स्वाभाविक उत्तराधिकारी बताते हुए 53वां सैय्यदना घोषित कर दिया तथा जून 2014 में अपने भतीजे के दावे को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दे दी.
अदालत के बार-बार नोटिस जारी करने के बावजूद मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन अदालत में हाज़िर नहीं हुए. यह मुक़दमा जारी रहने के दौरान ही 30 मार्च 2016 को खुजेमा क़ुतुबुद्दीन का निधन हो गया चूंकि उन्होंने अपने निधन से पहले ही अपने बेटे ताहिर फ़ख़रुद्दीन को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था, लिहाज़ा ताहिर फ़ख़रुद्दीन ने उनकी जगह संभाल ली और उन्होंने ख़ुद को 54वां सैय्यदना घोषित कर दिया.
अपने चाचा के निधन के तुरंत बाद मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन ने अपने वकील के माध्यम से अदालत से अनुरोध किया कि चूंकि अब खुजेमा क़ुतुबुद्दीन की मौत हो गई है, लिहाज़ा यह मुक़दमा ख़ारिज कर दिया जाए.
इस पर ताहिर फ़ख़रुद्दीन ने आपत्ति की. अदालत ने उनकी आपत्ति स्वीकार करते हुए मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन की अपील को ख़ारिज कर दिया और आदेश दिया कि मुक़दमा जारी रहेगा. ताया जाता है कि ताह़िर सैफ़ुद्दीन को भारतीय बोहराओं में तो उतना समर्थन नहीं है लेकिन अमरीका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, मिस्र, सऊदी अरब आदि देशों में बसे दाऊदी बोहरा मुसलमानों का एक तबक़ा उन्हें ही अपना 54वां सैय्यदना मानता है.
अब्दुल अली को भरोसा है कि भले ही भारत के दाऊदी बोहराओं का बहुमत अभी मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन को अपना सैय्यदना मानता हो लेकिन अदालत उनके भाई ताहिर फ़ख़रुद्दीन के दावे को ही स्वीकार करेगी, क्योंकि हमारा पक्ष बहुत मज़बूत और न्यायसंगत है.वें सैय्यदना के उत्तराधिकार के मुक़दमे के अलावा मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन को सुप्रीम कोर्ट में भी एक गंभीर मुक़दमे का सामना करना पड़ रहा है. यह मुक़दमा है दाऊदी बोहरा समुदाय में छोटी बच्चियों का ख़तना (फ़ीमेल जेनाइटल म्यूटिलेशन) से संबंधित.
दाऊदी बोहरा समुदाय में धर्म के नाम पर लंबे समय से चली आ रही इस रवायत को अमानवीय बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.
दाऊदी बोहरा समुदाय धर्मगुरू के आदेश से जारी इस परंपरा पर इस समुदाय के ही सुधारवादी वर्ग से जुडीं पुणे निवासी मासूमा रानलवी कहती हैं कि क़ुरान या हदीस में इस तरह की किसी परंपरा का ज़िक्र नहीं है.
मासूमा कहती हैं, "यह बेहद अमानवीय रवायत है, इसे अमरीका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया में अपराध घोषित किया जा चुका है. ऑस्ट्रेलिया में तो इस सिलसिले में जोर जबर्दस्ती करने के आरोप में वहां के आमिल सैय्यदना के प्रतिनिधि को जेल भी भेजा जा चुका है. इसी तरह अमरीका में भी बच्चियों का ख़तना करने वाले एक डॉक्टर को भी जेल की हवा खानी पड़ी है.'' प्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सैय्यदना के साथ ही केंद्र सरकार को भी नोटिस जारी कर उनका पक्ष जानना चाहा है, हालांकि केंद्र सरकार ने अपने जवाब में सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह इस तरह की परंपरा के पक्ष में नहीं है, लेकिन बोहरा समुदाय के धर्मगुरू वर्ग को अभी भी भरोसा है कि केंद्र सरकार अपने रुख़ में बदलाव कर लेगी.
अपने को 54वां सैय्यदना बताने वाले ताहिर फ़ख़रुद्दीन के छोटे भाई अब्दुल अली इस मामले में कहते हैं, 'बच्चियों का खतना' कोई धार्मिक परंपरा नहीं है, हमारा मानना है कि 18 वर्ष तक की बच्चियों का ख़तना तो किसी भी सूरत में होना ही नहीं चाहिए और 18 वर्ष की उम्र के बाद यह व्यक्ति की मर्ज़ी पर निर्भर होना चाहिए."श-विदेश में जहां-जहां भी बोहरा धर्मावलंबी बसे हैं, वहां सैय्यदना की ओर से अपने दूत नियुक्त किए जाते हैं, जिन्हें आमिल कहा जाता है. ये आमिल ही सैय्यदना के फ़रमान को अपने समुदाय के लोगों तक पहुंचाते हैं और उस पर अमल भी कराते हैं.
स्थानीय स्तर पर सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों पर भी इन आमिलों का ही नियंत्रण रहता है. एक निश्चित अवधि के बाद इन आमिलों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर तबादला भी होता रहता है.
बोहरा धर्मगुरू सैय्यदना की बनाई हुई व्यवस्था के मुताबिक़ बोहरा समुदाय में हर सामाजिक, धार्मिक, पारिवारिक और व्यावसायिक कार्य के लिए सैय्यदना की रज़ा (अनुमति) अनिवार्य होती है और यह अनुमति हासिल करने के लिए निर्धारित शुल्क चुकाना होता है.
शादी-ब्याह, बच्चे का नामकरण, विदेश यात्रा, हज, नए कारोबार की शुरुआत, मृतक परिजन का अंतिम संस्कार आदि सभी कुछ सैय्यदना की अनुमति से और निर्धारित शुल्क चुकाने के बाद ही संभव हो पाता है.
यही नहीं, सैय्यदना के दीदार करने और उनका हाथ अपने सिर पर रखवाने और उनके हाथ चूमने (बोसा लेने) का भी काफ़ी बडा शुल्क सैय्यदना के अनुयायियों को चुकाना होता है. इसके अलावा समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी वार्षिक आमदनी का एक निश्चित हिस्सा दान के रूप में देना होता है.
आमिलों के माध्यम से इकट्ठा किया गया यह सारा पैसा सैय्यदना के ख़ज़ाने में जमा होता है. ई-अल-मुतलक़ यानी सैय्यदना दाऊदी बोहरों के सर्वोच्च आध्यात्मिक धर्मगुरू ही नहीं बल्कि समुदाय के तमाम सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और पारमार्थिक ट्रस्टों के मुख्य ट्रस्टी भी होते हैं. इन्हीं ट्रस्टों के ज़रिए समुदाय की तमाम मस्जिदों, मुसाफ़िरख़ानों, शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, दरगाहों और क़ब्रिस्तानों का प्रबंधन और नियंत्रण होता है.
इन ट्रस्टों की कुल संपत्ति पचास हज़ार करोड़ रुपए से अधिक की बताई जाती है. बोहरा समाज के सुधारवादी आंदोलन से जुडे कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन ट्रस्टों के आय-व्यय तथा समाज के लोगों से अलग-अलग तरीक़े से जुटाए गए धन का कोई लोकतांत्रिक लेखा-जोखा समाज के लोगों के सामने पेश नहीं किया जाता. जबकि सैय्यदना के समर्थकों का दावा है कि इस पैसे का इस्तेमाल शैक्षणिक संस्थानों और अस्पतालों के संचालन तथा अन्य पारमार्थिक कार्यों में ख़र्च किया जाता है.
सैय्यदना की बनाई हुई व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति या उसके परिवार की बराअत (सामाजिक बहिष्कार) का फ़रमान सैय्यदना की ओर से जारी कर दिया जाता है. सैय्यदना के आदेश के मुताबिक़ समाज से बहिष्कृत व्यक्ति या परिवार से समाज का कोई भी व्यक्ति किसी भी स्तर पर संबंध नहीं रख सकता.
बहिष्कृत व्यक्ति अपने परिवार में या समाज में न तो किसी शादी में शरीक हो सकता है और न ही किसी मय्यत (शवयात्रा) में. बहिष्कृत परिवार में अगर किसी की मृत्यु हो जाए तो उसके शव को बोहरा समुदाय के क़ब्रिस्तान में दफ़नाने भी नहीं दिया जाता.
पिछले कुछ वर्षों से सैय्यदना के आदेश पर समाज के प्रत्येक व्यक्ति (नवजात बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक) का परिचय पत्र तैयार किया जाने लगा है. आधार कार्ड की तर्ज़ पर कंप्यूटर से बनाए जाने वाले इस आईटीएस (इदारतुल तारीफ़ अल शख्सी) कार्ड के ज़रिए ही हर व्यक्ति समाज की मस्जिद, जमाअतख़ाना, मुसाफिरख़ाना, क़ब्रिस्तान आदि स्थानों पर प्रवेश कर सकता है.
इस कार्ड के ज़रिए एक तरह से समाज के हर व्यक्ति की हर सामाजिक गतिविधि की निगरानी की व्यवस्था की गई है. जिस किसी भी व्यक्ति की कोई भी गतिविधि धर्मगुरू वर्ग की कसौटी पर ज़रा भी संदेहास्पद पाई जाती है, उसका आईटीएस कार्ड ब्लाक कर दिया जाता है. कार्ड ब्लॉक हो जाने पर उस व्यक्ति का समाज की मस्जिद, जमाअतख़ाना, मुसाफ़िरख़ाना क़ब्रिस्तान आदि जगहों पर प्रवेश स्वत: ही निषिद्ध हो जाता है.
सैय्यदना की ओर से यह किसी व्यक्ति के सामाजिक बहिष्कार की आधुनिक व्यवस्था ईजाद की गई. उदयपुर, मुंबई, पुणे, सूरत, गोधरा आदि शहरों में सैकडों बोहरा परिवार इस समय सामाजिक बहिष्कार के शिकार हैं.
दरअसल, दाऊदी बोहरा समुदाय में सुधारवादी आंदोलन की शुरुआत 1960 के दशक में नौमान अली कांट्रेक्टर ने की थी. उनके दौर में तो यह आंदोलन ज्यादा ज़ोर नहीं पकड़ पाया, लेकिन उनके निधन के बाद जब इस आंदोलन की कमान 1980 के दशक में डॉ. असग़र अली इंजीनियर ने संभाली तो इस आंदोलन का तेज़ी से विस्तार हुआ.
इंजीनियर ने उन सभी देशों का दौरा किया, जहां-जहां दाऊदी बोहरे बसे हैं. यही नहीं, उन्होंने देश के कई जाने-माने बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पूर्व न्यायाधीशों, लेखकों और कलाकारों को भी अपने आंदोलन से जोड़ा लेकिन उनकी मौत के बाद आंदोलन ठंढा पड़ गया.
बोहरा' गुजराती शब्द 'वहौराउ' अर्थात 'व्यापार' का अपभ्रंश है, यह समुदाय मुस्ताली मत का हिस्सा है, जो 11वीं शताब्दी में उत्तरी मिस्र से धर्म प्रचारकों के माध्यम से भारत में आया था.
1539 के बाद जब भारत में इस समुदाय का विस्तार हो गया तो ये लोग अपना मुख्यालय यमन से भारत के सिद्धपुर (गुजरात) में ले आए. 1588 में 30वें सैय्यदना की मृत्यु के बाद उनके वंशज दाऊद बिन कुतुब शाह और सुलेमान शाह के बीच सैय्यदना की पदवी और गद्दी पर दावेदारी को लेकर मतभेद हो गया, जिससे दो मत क़ायम हो गए और दोनों के अनुयायियों में भी विभाजन हो गया.
दाऊद बिन कुतुब शाह को मानने वाले दाऊदी बोहरा और सुलेमान को मानने वाले सुलेमानी बोहरा कहलाने लगे, सुलेमानी बोहरा संख्या में दाऊदी बोहरों के मुक़ाबले बेहद कम थे और उनके प्रमुख धर्मगुरू ने कुछ समय बाद अपना मुख्यालय यमन में क़ायम कर लिया और दाऊदी बोहरों के धर्मगुरू का मुख्यालय मुंबई में क़ायम हो गया.
बताया जाता है कि दाऊदी बोहरों के 46वें धर्मगुरू के समय इस समुदाय में भी विभाजन हुआ तथा दो अन्य शाखाएं क़ायम हो गईं. इस समय भारत में बोहरा समुदाय की कुल आबादी लगभग 20 लाख है, जिसमें 12 लाख से ज्यादा दाऊदी बोहरा हैं, तथा शेष आठ लाख में अन्य शाखाओं के बोहरा शामिल हैं.
दो मतों में विभाजित होने के बावजूद दाऊदी और सुलेमानी बोहरों के धार्मिक सिद्धांतों में कोई ख़ास बुनियादी फ़र्क़ नहीं है. दोनों समुदाय सूफियों और मज़ारों पर ख़ास आस्था रखते हैं.
सुलेमानी जिन्हें सुन्नी बोहरा भी कहा जाता हैं, हनफी इस्लामिक क़ानून पर अमल करते हैं, जबकि दाऊदी बोहरा समुदाय इस्माइली शिया समुदाय का उप-समुदाय हैं और दाईम-उल-इस्लाम के क़ायदों को अमल में लाता है.
यह समुदाय अपनी प्राचीन परंपराओं से जुड़ा समुदाय है, जिनमें सिर्फ़ अपने ही समुदाय में शादी करना भी शामिल है. कई हिंदू प्रथाओं को भी इनके सामाजिक व्यवहार में देखा जा सकता है.
भारत में दाऊदी बोहरा मुख्यत: गुजरात में सूरत, अहमदाबाद, बडोदरा, जामनगर, राजकोट, नवसारी, दाहोद, गोधरा, महाराष्ट्र में मुंबई, पुणे, नागपुर औरंगाबाद, राजस्थान में उदयपुर, भीलवाड़ा, मध्य प्रदेश में इंदौर, बुरहानपुर, उज्जैन, शाजापुर के अलावा कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरू, और हैदराबाद जैसे महानगरों में भी बसे हैं.
पाकिस्तान के सिंध प्रांत के अलावा ब्रिटेन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, दुबई, मिस्र, इराक़, यमन व सऊदी अरब में भी उनकी ख़ासी तादाद है.

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