Thursday, August 8, 2019

वो राज्य जहां ज़मीन खरीदकर नहीं बस सकते

भारत में सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर इकलौता प्रदेश नहीं है जहां बाहर के लोग ज़मीन ख़रीदकर बस नहीं सकते या फिर ज़मीन ख़रीदकर उद्योग नहीं लगा सकते.
अनुच्छेद 370 की वजह से जम्मू-कश्मीर में प्रदेश के 'स्थायी नागरिकों' के अलावा किसी के बसने का प्रावधान नहीं है.
इतना ही नहीं, अगर कोई कश्मीरी लड़की किसी बाहरी से विवाह कर ले तो उसका अपने पिता या पूर्वजों की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रहता.
लेकिन ऐसा नहीं है कि विशेष अधिकार सिर्फ़ जम्मू और कश्मीर के लोगों तक ही सीमित रहा है. 'सात बहनों' के रूप में जाने जाने वाले पूर्वोत्तर राज्यों को भी इस तरह का दर्जा मिला हुआ है जहां बाहर के लोग ना ज़मीन ख़रीद सकते हैं और ना ज़मीन ख़रीदकर उद्योग लगा सकते हैं.
असम के अलावा सिक्किम, त्रिपुरा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मेघालय के अलावा त्रिपुरा में भी कई इलाक़े हैं जहां इसी तरह के संवैधानिक प्रावधान किये गए हैं ताकि स्थानीय लोगों की आबादी बाहरी लोगों के आने से कम ना हो जाए.
ऐसे संवैधानिक प्रावधान हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और झारखंड जैसे राज्यों में भी बनाये गए हैं.
इन राज्यों को दो श्रेणियों में रखा गया है - संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची.
जो राज्य पूरे के पूरे छठी श्रेणी में आते हैं वहां स्थानीय लोगों के स्वायत्त शासन का प्रावधान रखा गया है. पांचवीं अनुसूची के भी कई इलाक़े हैं जहां स्वायत्त शासन लागू है.
मसलन आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के आदिवासी बहुल इलाक़े. ये संविधान की पांचवीं अनुसूची में आते हैं.
जिन-जिन राज्यों में पांचवीं अनुसूची लागू है वहां के राज्यपालों को संविधान ने कई शक्तियां दीं हैं. ये सिर्फ़ राज्यपाल ही नहीं बल्कि उस राज्य के आदिवासियों के अभिभावक भी कहलाते हैं. इन इलाक़ों में भी बाहर के लोग ज़मीन नहीं ख़रीद सकते.
अनुसूचित इलाक़ों का परिसीमन आदिवासियों की आबादी पर निर्भर करता है. समय-समय पर इन इलाक़ों को बढ़ाया या घटाया जा सकता है.
'ट्राइबल एडवाइज़री काउंसिल' की सिफ़ारिशों पर राज्यपाल फैसले लेते हैं. इन्हीं सिफ़ारिशों पर विकास की परियोजनाओं को भी हरी झंडी मिलती है. इसमें ग्राम सभाओं की भी अहम भूमिका है.
आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, और झारखण्ड के अलावा कई राज्यों में 'हिल एरिया डेवलपमेंट काउंसिल' की भी व्यवस्था है जो स्वतंत्र तौर पर फ़ैसले लेती है.
अनुसूचित इलाक़ों में राज्यपालों को इतनी संवैधानिक शक्ति प्रदान की गई है कि वो परिस्थिति को देखते हुए किसी भी क़ानून को अपने राज्य में लागू होने से रोक सकते हैं या फिर लागू कर सकते हैं.
अनुसूचित इलाक़ों के लिए बनाये गए अधिनियमों के मुताबिक़ ज़मीन को बेचने पर पूरी रोक है.
इसके कुछ उदाहरण झारखण्ड में लागू संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम और छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के रूप में हैं जहां किसी भी स्थानीय आदिवासी की ज़मीन ख़रीदी या बेची नहीं जा सकती.

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